Thursday, 30 June 2011

प्रेम की परिभाषा...

एक एहसास..
एक विश्वास...
एक आस..
एक साथ..
एक समर्पण..
एक संगम..
एक दर्द..
एक मरहम..
एक ख़ुशी.. 
एक हंसी..
एक तपस्या..
एक त्याग..
एक ऐसी अनुभूति जिसके बिना जीवन अधूरा है.....

‎!!रह जाते हम भी बच्चे ही अगर!!

न जाने कब बचपन ने साथ छोड़ा..
और समझदारी ने आते ही हर पल दिल तोड़ा...
कभी परायों ने तो कभी अपनों ने..
कभी अपने ही साये ने भी साथ छोड़ा..
इस बेदर्द दुनिया में नए थे हम..
किसी से एक सवाल पूछ बैठे...
क्या दुनिया इतनी ही बेदर्द होती है???
किसी सच्चे दोस्त ने हमें समझाया..
उसके जवाब ने हमे चौंकाया...
उसने इस दुनिया से हमे मिलाया..
इसका असली चेहरा दिखाया..
इस बेदर्द ज़माने में कोई अपना न मिला..
सब ने सिर्फ मतलब के लिए दोस्त बनाया..
एहसास मर चुके हैं..
मर चुका है सबका ज़मीर...
सिर्फ बातों में हैं सिद्धांत ..
सिर्फ नाम के लिए हैं विश्वास...
खुद को भी देते हैं धोखा ..
तो दुनिया से किसको डर होगा..
अगर पता होता की ऐसी होती है ज़िन्दगी..
तो कौन बड़ा होता..
रह जाते हम भी बच्चे ही ..
अगर इस दर्द का पहले कभी एहसास होता...

अपने दिल की किताब पर ...


अपने दिल की किताब पर  लिख कर नाम किसी का ...
दुनिया की दौड़ में चल पड़े थे हम...
सहारा था उसके ही प्यार का हमे...
उसी के सहारे जीना चाहते थे हम..
न जाने कहाँ खो गया अचानक  वो सहारा...
ढूँढ़ते रह गए उसके निशाँ हम..
आज बीत गया है एक अरसा मगर...
उसकी याद में खोये रहते हैं हम...
न जाने वो लौटेगा की नहीं...
पर आज भी उसके लौटने इंतज़ारकरते हैं हम..