ज़िन्दगी की किताब के कुछ पन्ने सुनाती हूँ..
अपनी ख़ुशी और दुःख का ताना बाना बनाती हूँ..
कभी खुद हंसती हूँ..कभी दूसरों को हंसाती हूँ...
कभी मैं हूँ सबसे बहादुर..कभी कमज़ोर पड़ जाती हूँ..
कभी दर्द में भी मुस्कुराती हूँ..कभी ख़ुशी में आंसू बहाती हूँ..
कभी अपनों का सहारा बनती हूँ..कभी उनको अपना सहारा बनती हूँ..
कभी दोस्तों से खफा तो कभी उनको ही मानती हूँ...
कभी तन्हाई में भी अकेली नहीं..कभी भीड़ में भी खुद को तन्हा हूँ..
अपने इन लफ़्ज़ों में अपने एहसास बताती हूँ...
ज़िन्दगी की किताब के कुछ पन्ने सुनाती हूँ..
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