दुनिया से छुपा के अपने कर्मों को,
बन्दे तू कहाँ छुप पायेगा ...
अपनी अंतरात्मा की धिक्कार से..
तू खुद को कैसे बचा पायेगा..
चाहे दुनिया समझे तुझे सच्चा...
या बनके दिखाए तू सबसे अच्छा..
तेरे कर्मों के साये तेरा साथ न छोड़ेंगे.
तेरे किये हुए परपंच तुझे पल पल तोड़ेंगे...
दुनिया की नज़रों से भले ही भाग लेगा तू..
लेकिन अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे पायेगा..
दिए जो ज़ख्म अपनों और परायों को..
उनका हिसाब खुद को क्या दे पायेगा..
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