दुनिया की दौड़ में हम चलते हुए अकेले...
सोचा करते थे कैसे मिलेगी मंजिल हमे...
किसी सहारे बिना लड़ना होगा सारे जहां से...
किससे मिलेगी लड़ने की तालीम हमे...
बिना होंसला लिए निकल पड़े ज़माने की भीड़ में...
न कोई उम्मीद थी न किसी का सहारा हमे...
बस खुद का ही सहारा था और खुद की थी तालीम...
आखिर मिलने लगी राह मंजिल की हमे..
ठोकरों ने दी तालीम, हार बनी सहारा...
फिर भी बढ़ते रहे न ढूँढा कोई हमारा...
आखिर हार ने भी मानी हार हमसे...
और जीत ने थामा दामन हमारा..
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